Monday, February 9, 2009

रद्दी वाला भी हिन्दी को भाव नहीं देता , क्यों ?

"भाई साहब" ब्रांड पत्रकारिता का बहुत छोटा सा प्यादा रहा हूँ। आप पहली तीन किस्तें पढ़ कर समझ गए होंगे। राजा और वजीर कहानी बहुत लम्बी है कभी न ख़त्म होने वाली। बस पात्र बदलते हैं, पीड़ा भोगने और पीड़ा सहने का सिलसिला मुसलसल चल रहा है और चलता रहेगा। राजा और वजीर अपना स्वाभाव नहीं बदलते और प्रजा (प्यादा भी कह सकते हैं) ज़ुल्म सहने के लिए ही होती है। इसलिए कहानी का रुख अब किसी खास ओहदे की और नहीं मोड़ रहा हूँ जो भोग है वही लिख रहा हूँ।

मैंने खास तौर से एक विशेषण इस्तेमाल किया है "भाई साहब" ब्रांड हिन्दी पत्रकारिता। लंबे अनुभव के बाद हिन्दी पत्रकारिता का यही चरित्र समझ में आया। कहीं वैचारिक मतभेद हो तो माफ़ कर देना। एक जमात (पत्रकारों की) राजा और वजीर को "भाई साहब" कह कर अक्सर सम्भोदित करती है और दोनों जमात के पत्रकारों के बीच बडे भाई और छोटे भाई का रिश्ता कायम हो जाता है। फिर "भाई" मिलकर मिशनरी पत्रकारिता के रथ को खींचते हैं। उस रथ के पथ पर कोई बेवजह खडे होने की घ्र्ष्टता करता पाया गया तो रथ के पहिये से कुचला भी जा सकता है।

एक्सप्रेस ग्रुप की लम्बी नौकरी में एक बात और समझ में आई। भाई साहबों की पत्रकारिता मिस्टर सो एंड सो ब्रांड की पत्रकारिता के सामने मिम्म्याती सी नज़र आई। मुझे ये भी ज्ञान प्राप्त हुआ के हिन्दी ही नहीं वर्नाकुलर लैंगुएज journalism की अंग्रेज़ी के सामने स्वाभाविक दास जैसी स्थिति है। अंग्रेज़ी की उपेक्षा कर किसी भी भारतीय भाषा में पत्रकारिता नहीं हो सकती। हिन्दी के मठाधीश पत्रकार भी इंग्लिश जर्नलिस्ट के आगे अपनी हैसियत का एहसास रखते हैं। यह सब यूँही नहीं है। मालिकों से लेकर रद्दी खरीदने वाला कबाडी तक यह एहसास है। कबाडी वाला हमेशा अंग्रेज़ी अख़बारों के मुकाबले हिन्दी अखबारों की रद्दी कम दामों पर खरीदता है। हलाँकि में ने कई बार कबाडी से कहा - भाई मैं अखबार में काम करता हूँ । एक्सप्रेस और जनसत्ता एक ही न्यूज़ प्रिंट पेपर पर छपते हैं एक ही मशीन है, स्याही में कोई फर्क नहीं है, छापने वाले लोग भी वही हैं, फिर रद्दी के दामों में फर्क क्यों? रद्दी वाला कबाडी एक ही जवाब देता है - आप सच बोल रहे है पर दोनों में फर्क तो है, हिन्दी के दाम अंग्रेज़ी के बराबर नहीं लगा सकता। और जिस भाषा से रोटी खाता हूँ उसे सस्ती मान कर रद्दी बेच देता हूँ। कबाडी इस फर्क को समझता है या उसे यह फर्क समझाया गया है? तो मैं कैसे मान लूँ के अखबारों के मालिक इस यथार्थ को नहीं समझते होंगे।

विदेश में कवरेज की बात आती है तो प्रबंधकों की दलील होती है : खर्चे कम करो। अंग्रेज़ी का पत्रकार प्रेजिडेंट, पी एम् के साथ जाएगा और हिन्दी में उसका अनुवाद हो जायेगा। कभी ऐसा नहीं देखा के हिन्दी का पत्रकार भूले भटके चला जाए और अंग्रेज़ी वाले अनुवाद कर लें। खेलों की कवरेज भी ऐसे ही होती है। एक बार प्रतिष्ठित ग्रुप ने तो यहाँ तक फ़ैसला कर लिया था की उनका सर्वाधिक सिर्कुलेशन वाला राष्ट्रीय हिन्दी दैनिक पूरी तरह अंग्रेज़ी अखबार का अनुवाद होगा। इस का ज़ोरदार विरोध हुआ और प्रबंधकों को फ़ैसला वापस लेना पड़ा। काश ! हिन्दी के साथ सौतेला व्यव्हार मिटाने के लिए भी ऐसा ही कोई विरोध होता; किसी आन्दोलन की शक्ल में।

कुछ मालिक अंग्रेज़ी अखबारों के साथ हिन्दी अखबार इस लिए निकालते हैं के दो भाषाओँ में विज्ञापन देने की औपचारिकता निभाने वालों को निराश ना लौटना पडे। यही वजह है के विज्ञापन पैकेज में अंग्रेज़ी के साथ हिन्दी को क्लब किया जाता है नही के हिन्दी के साथ अंग्रेज़ी को।

अब लाइब्रेरी में आ जाएये, वहां भी ऐसी ही स्थिति है। क्लिप्पिंग अंग्रेज़ी अखबारों की राखी जाती है। अपवाद स्वरूप किसी संस्थान में हिन्दी अखबारों की क्लिप्पिंग रखने का चलन शुरू हो गया हो तो इसकी जानकारी नहीं है। बहुत जानने की कोशिश की कोई मुकम्मल जवाब नहीं मिला। बस फर्क है! अंग्रेज़ी सुपेरिओर है और हिन्दी दोयम दर्जे की।

दर्जे का दर्द सभी झेलते हैं, महसूस करते हैं पर सामाजिक स्थितियां इस फर्क को मिटाने के लिए किसी को प्रेरित नहीं करती हैं। हम इसे नियति मान कर चले जा रहे हैं। कुछ पत्रकार दोहरा दर्द सहते है। उन्हें अपनी ही "बस्ती" में न्याय नहीं मिलता, फिर वो निष्ठां से काम करते रहने का संतोष ज़रूर पाना चाहते हैं; शायद विकल्प के अभाव में मजबूरी को निष्ठां का जामा पहना देते हैं।

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