Saturday, February 7, 2009

जनसत्ता के “खाकी निकरवालों” को मैं “ लाल” उमेश चुभता रहा


अक्खड़ स्वभाव और अखाड़ेबाज़ संपादकों के कारण जनसत्ता में पूरी पारी नहीं खेल पाया। अपनी सबसे बड़ी कमी एक और भी थी। मैं खाकी निकर पहनकर दफ्तर नहीं जाता था। खाकी निकरवालों के लिए सब माफ था। अक्खड़ स्वभाव भी बर्दाश्त हो जाता था। लेकिन मेरे “ लाल” रंग को देखकर दो संपादकों तो हर वक़्त बिदके रहे, मरखने सांड़ की तरह।
“ बेचारे” निकाल तो सकते नहीं थे, तरक्की देना ज़रूर उनके हाथ में था। उसमें खुलकर बेशर्मी का खेल खेला गया। सारे क़ायदे –क़ानून को ताक पर रखकर खाकी निकरवालों को तरक्की देकर हमें पीछे छोड़ दिया गया और संकेत दिया गया कि ऐसा ही होगा; अपमानित होकर रहना चाहो तो रह सकते हो। उन दो संपादकों में से एक का रिकार्ड तो यही रहा है कि , जहां भी गए हैं अपना गुट तैयार किया है। मुझे उन संस्थानों के मालिकों से हमदर्दी रही है । वो मालिक भी क्या करे, उन्हे मक्कारी के जाल में फंसाल कर ऐसा इंप्रेशन दिया जाता है कि उनसे ( संपादक जी) भला “व्यक्ति” और “ योग्य” संपादक कोई और हो ही नहीं सकता। उनकी योग्यता और प्रतिभा किन क्षेत्रों में है, इसका मैं संकेत दे ही चुका हूं। धीरे-धीरे कई चौखट घिस चुके हैं। जहां जाते हैं, जल्द ही उनकी असलियत मालिक और मातहत समझ जाते हैं और “ नागरिक अभिनंदन” कर विदा कर दिए जाते हैं। इन स्थितियों को मैं पत्रकारिता का साइलेंट टैररिज़्म मानता हूं।
जनसत्ता के एक संपादक बनवारी जी का ज़िक़्र करना ज़रूर चाहूंगा. जिनमें सहीं मायने में संपादक की गरिमा थी। सरल, सहज और संकोची स्वभाव; सहकर्मियों के हमदर्द। दफत्र में वो अकेले सीनियर पत्रकार थे, जिनका हर कोई इज्ज़त करता था। वो भी प्रबंधकीय निक्कमेपन से दुखी होकर जनसत्ता छोड़ गए। प्रबंधकों को ‘सत्यानाशी” संपादक की ज़रूरत थी और बनवारी जी में वो गुण नहीं थे। इसिलए उनके साथ भी वही किया गया, जो मेरे साथ हुआ।
प्रभाष जी की प्रतिभा का मैं क़ायल रहा हूं। मैं हूं क्यों, जनसत्ता का हर पाठक औऱ हर कर्मचारी प्रभाष जी को बेजोड़ संपादक मानता है। लेकिन कई बार वो संपादक कम और मालिक ज़्यादा दिखते रहे। उनकी भाषा से अहसास होता था कि रामनाथ गोयनका की आत्मा उनमें प्रवेश कर गई है। एक उन्होने मुझे लिफ़ाफ़े में बंद कर चंद लाइनों का पत्र भिजवाया था, जो आज भी मैं संभाल कर रखा है। उसमें प्रभाष जी का दंभ, क्रूरता और राग-द्वेष कूट-कूटकर भरी हुई है। शायद रामनाथ गोयनका ने भी कभी वो भाषा इस्तेमाल नहीं की होगी। वो पत्र देखकर बनवारी जी बेहद आहत हुए थे।
जनसत्ता में मेरे कार्यकाल के अंतिम संपादक ने अपने पूर्ववर्ती संपादकों की परंपरा को बखूबी निर्वहन किया । उन्हे “परपीड़ा” में जो सुख मिलता है, वह शब्दों में बताना मेरे लिए मुमक़िन नहीं है। अंतत: मैं योग्य, निर्भीक , प्रतिभाशाली, मूर्धन्य और जनसत्ता ब्रांड के संपादकों के सामने नहीं टिक पाया औऱ हारे योद्धा की तरह श्वेत ध्वज लेकर 4 मई 2004 को विशाल एक्सप्रेस बिल्डिंग से बाहर निकल आया। वीआरएस के पेपर साइन कर निकला था। फिर भी उस रात को ड्यूटी पर गया। उस रात मुझे एडिशन निकालना था। नाता तो दिन में ही टूट गया थालेकिन प्रोफेशनल ज़िम्मेदारी से भागना फितरत में नहीं है। इसलिए एडिशन छोड़कर ही अपनी ज़िम्मेदारी से मुक्त हुआ।
आगे क्या करता है; इसकी कोई योजना नहीं थी। कुछ दिन दिल्ली में बिताकर गांव चला गया था। खेती-बाड़ी करने का मूड था। पहले खेती-किसानी कर चुका हूं। खेतों में हल चलाया है, फ़सलों की बिजाई-कटाई अपने हाथों से की है। ठेठ किसान रहा हूं। फिर से किसानी करने में परहेज़ भी नहीं है। लेकिन टोटल टीवी के डायरेक्टर विनोद मेहता का संदेशा आया. जुड़ने के लिए। एक बार फिर कमर कस कर 22 अक्तूबर 2004 को पत्रकारिता से जुड़ गया । तब से कलम के बजाए कंठ की पत्रकारिता कर रहा हूं। कलम कभी-कभार।

क्रमश:

11 comments:

  1. वरेण्य जोशी जी, पत्रकरिता का पूरा पेशा जोड़-तोड़ से भरा हुआ है। आप जैसे वरिष्ठ लोगों सदैव अपेक्षा रहेगी की जो भोगा है जहां तक हो सके अपने कनिष्ठों के सामने वैसी स्थिति न पैदा होने दें। साथ अनुरोध है कि जिनसे कड़वे अनुभव मिले हैं उनके प्रति क्षमा व विनम्रता का भाव बना रहे तो हम आने वाली पीढ़ियों को शायद कुछ बेहतर संदेश दे सकेंगे।
    बृजेश सिंह- पत्रकार

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  2. जी.....अरसे से मन में कौंध रहे उस सवाल का जवाब मिल गया कि आखिर मिशन से प्रोफेशन में क्यूं और कैसे तब्दील हो गई अखबार नवीसी। जब विचार थोपे जाने लगें, नीति नियंताओं की नीयत साफ न रह जाए तो खुद को उस धारा से विलग कर लेने का साहस दिखाने में देर नहीं करनी चाहिए। आप में साहस लबालब भरा है। हम भी प्रेरणा लेते रहेंगे।

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  3. Dear Joshiji,

    You could show the courage to call an axe an axe.The truth must come out.This is how people will know the naked facts about the so called professionals. The article shows how cruel this world for those who does not fall in line with the 'BIG BOSS'. Keep writing.

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  4. जनसत्ता पर केंद्रित आपके ब्लॉग से लगता है कि आपका इरादा भविष्य में जनसत्ता के दिनों की याद ताजा कर देने का है। मुझे बोलने दो नाम से भी यही लगता है कि मन में दबी-छिपी बातें कहने से आप संकोच नहीं करेंगे। अच्छा है। आपके पोस्ट का इंतजार रहेगा। इसस बाहर वालों को यह अंदाजा भी लग जाएगा कि जनसत्ता का यह हाल क्यों हुआ। - संजय कुमार सिंह

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  5. sir,itni safgoi ki ummid ek buland shakhshiyat se hi ki ja sakati hai.bahut khoob likha hai aapne.apke agale post ka intzar hai

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  6. sir,
    aapke blog ko padh ker bohot acha lagta hai ke iss dhongi aur dikhawati duniya main koi tou hai jo bina kisi darr aur lalach ke apne dil ki baat sachchayi se saamne rakh raha hai. main aapke lekhon ko padh ker thoda bohot andaza laga sakta hoon ke aap kis mansik peeda se guzrey honge, kyun ke thoda bohot tou main bhi aapko jaanta hoon ke aap kis swabhav ke vyakti hain, kitne uchch vichaar rahe honge aapke. aapke is blog ke liye main apni ghazal ka shyer aap ko nazr ker raha hoon :

    "ANGAAR ZINDIGI SE JO PAAYE DIKHAYENGEY
    MOHABBAT KA KHUSHI KA KOI AFSAANA NAHIN AATA"

    hum sabhi paathakon ko aap se hamesha aise hi sachchayi ki umeed rahegi.

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  7. sir charan sapras sir aap ne o kahawat sach kar di der aaye durust aaye jabaye phir se naye josh ke sath aaye ab tak aap ne jo bhi kam kahi bhi kiya us kam ko dil se kiya sir aap ne jo likha hai wah padhkar hame aap ke sath huye anneyay ka pata chala sir aap jaise dil se kam karte hai hame ummed hai ki hamesha dil se kam karte rahge hum bhagwan se prarthna karte hai ki aap humesh swasth rahe or hame aap ka aashirwad parpat hota rahe pratap singh your soon aal staf in total tv 1206 ph.9911956906

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  9. यह उमेश जोशी का भड़ास है। इससे कदापि इस निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा जा सकता कि जनसत्ता की मौजूदा स्थिति के लिए तब की परिस्थितियां ही जिम्मेवार थीं।
    उमेश जोशी के साथ जो कुछ हुआ, जैसा कि उनका कहना है, उसके लिए मैं यह कदापि मानने को तैयार नहीं कि उनका खाकी निकर पहनकर दफ्तर नहीं जाना एकमात्र कारण था। यदि ऐसा होता तो अभय कुमार दूबे से लेकर सत्येंद्र रंजन तक के लिए जनसत्ता मे कोई जगह नहीं होती। अनिल चमड़िया जनसत्ता में कभी नहीं छपतें।
    इन सबसे इत्तर उमेश जोशी को जानने वाले इस बात को कभी गले नहीं उतार पाएंगे कि वे कम्युनिस्ट थे।
    श्री जोशी विशुद्ध रूप से सुविधाभोगी थे और उन्हें अभिजात्य व4ग की सारी सुविधाएं चाहिए थी। तभी तो जनसत्ता के वेतन से काम नहीं चलता था तो दूरदर्शन की सेवा करके अतिरिक्त धन जुटाना पड़ता था।
    जनसत्ता के संपादक का उनके साथ कैसा व्यवहार था, यह तो नहीं पता। परन्तु यदि वे संपादक के निशाने पर होते तो जनसत्ता की नौकरी करते हुए और ड्यूटी के समय मंडी हाऊस जाकर खबरें नहीं बांच रहे होतें।
    मैंने आज तक श्री जोशी का एक भी लेख नहीं पढ़ा, जिससे उनके लाल होने का भान भी होता। वह तो कामर्स डेस्क से चिपके रहकर पूंजीपतियों की कंपनियों को उपकृत करने में लगे रहते थे।
    किसी ने कुछ महीने पहले ही कहीं चर्चा की थी कि दिल्ली की विधानसाभा के चुनाव से पहले उमेश जोशी कांग्रेस की टिकट के लिए किस तरह एड़ियां रगड़ रहे थें।
    मुझे तो लगता है कि श्री जोशी जिस संस्थान में हैं, वहां कुर्सी बचाए रखने के लिए या दूसरी योजना को अमलीजामा पहनाने के लिए "लाल" होने की बाध्यता के कारण अचानक जनसत्ता के नामचीन संपादकों पर लाल हो गए हैं।

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  10. मेरे विचारों और अनुभवों से सबका सहमत होना ज़रूरी नहीं है। मेरे मित्र अजय जी का एक पोस्ट आया है। मैं उसका जवाब देना चाहता हूं। पहली बात अजय जी का प्रोफाइल खोजने की कोशिश की। नाकाम रहा। हो सकता है कि ये किसी महापुरूष का छद्म नाम हो, जो अपनी भड़ास तो निकालना चाहते हैं, लेकिन अपना नाम और सही परिचय बताने का सत्सहास उनमें नहीं है। ठीक वैसे ही, जैसे कि कुछ दिनों पहले मेरे मोबाइल पर किसी ने भाटी गैंग का सदस्य बनाकर धमकी दी थी। पलटकर फोन करने पर कई बार घंटी बजी और कई बार स्विच आफ मिला।
    मेरे विचारों और अनुभवों से सबका सहमत होना ज़रूरी नहीं है। मेरे मित्र अजय जी का एक पोस्ट आया है। मैं उसका जवाब देना चाहता हूं। पहली बात अजय जी का प्रोफाइल खोजने की कोशिश की। नाकाम रहा। हो सकता है कि ये किसी महापुरूष का छद्म नाम हो, जो अपनी भड़ास तो निकालना चाहते हैं, लेकिन अपना नाम और सही परिचय बताने का सत्सहास उनमें नहीं है। ठीक वैसे ही, जैसे कि कुछ दिनों पहले मेरे मोबाइल पर किसी ने भाटी गैंग का सदस्य बनाकर धमकी दी थी। पलटकर फोन करने पर कई बार घंटी बजी और कई बार स्विच आफ मिला।
    अजय जी जैसे भलमानुष जो इल्ज़ाम लगा रहे है, वो मेहरबानी कर सामने आएं और तीन गंभीर आरोपों का सबूत दें। पहला कि मैं बिज़नेस पेज पर रहकर व्यावसायिक घरानों का हित साधता रहा। इस मसले पर एक भी सबूत दे दें कि मैंने किसी टाटा, बिड़ला, अंबानी का हित साधा। दूसरा- मैंने किस नेता से दिल्ली में कांग्रेस का टिकिट मांगा। तीसरा मैने कब ड्यूटी छोड़कर कहीं और चाकरी की।
    अजय जी जैसे छद्म नाम वाले प्राणि दरअसल सामने नहीं आ सकते। वो शायद लता प्रजाति के प्राणि होते हैं, पौधे या पेड़ नहीं। दूसरों के सहारे जीनेवाले लोग अक्सर अपना परिचय भूल जाते हैं। वरना वो ये भी बताते कि ईमानदारी का चोला ओढ़कर संपादक रहते हुए सरकारी हेलीकॉप्टर पर फ्री में बिटिया के लिए वर देखने जाना कहां की ईमानदारी है और दूरदर्शन की एंकरिंग से कैसे तुलना हो सकती है। संपादक की कुर्सी पर रहते हुए शाम ढलते ही अख़ाबर छोड़कर आईसीसी में दारू पीना कहां की नैतिकता है। अजय जी या इस नाम की आड़ में जो भी हों,सच बोलने का साहस करें।

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  11. दिल्‍ली में अधिकांश पत्रकार नौकरी करते हुए आकाशवाणी, दूरदर्शन के अलावा अनुवाद का काम भी करते रहे हैं। लेकिन ऐसा वही करते हैं जो ईमानदारी और मेहनत की रोटी खाते हैं। हां! चंद्रा स्‍वामी से कीमती तोहफे लेने वाले, शाम को दारु पीने के लिए राजनीतिक या कूटनीतिक गलियारों में दुम हिलाने वाले पत्रकारों को इसकी जरुरत कभी नहीं रही।
    हिंदी पत्रकारों को नौकरी के अलावा दूसरे काम इसलिए देखने पड़ते थे क्‍योंकि उन्‍हें अपेक्षाकृत कम वेतन मिलता था और आज भी कई जगह निचले पायदानों पर एक पत्रकार को इतना वेतन मिलता है जिसमें वह पौष्टिक भोजन भी अपने परिवार को उपलब्‍ध करा सकता।

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