Sunday, August 21, 2011

यूं भी जीया जाता है

मेरे अपने के आदर्शों से प्रेरणा पाकर लिख रहा हूं। दुनियादारी के पैमाने पर गढ़े रिश्तों में से कोई छोर ढूंढ़ने की कोशिश करेंगे तो आप कहीं और उलझ जाएंगे और जिस मुद्दे पर आपको लाना चाहता हूं वो हाशिए पर चला जाएगा। स्वार्थ को आधुनिक सभ्यता से जोड़ कर समाज को पहचान देने वाले मेरे महानगर दिल्ली में एक न्यारा परिवार है जो स्वार्थों से कोसों दूर समाज को कुछ देने की चाह में मुसलसल काम कर रहा है। इस परिवार से दिसंबर 1972 से नाता है। 39 साल पहले मुझे इस शहर में पांव जमाने के लिए मेरी बड़ी बहन के अलावा इसी नातेदार परिवार ने हर वक्त संबल दिया। इस परिवार और इसकी धुरी करुणा और दया की साक्षात प्रतिमूर्ति रेणु जैन के कामों पर कभी विस्तार से लिखूंगा। अब यहां उस संवाद का जिक्र करूंगा जो टेलीफोन पर हुआ और जिससे मैं बेहद मुतास्सिर हूं। इस संवाद का जिक्र इसलिए भी करना चाहता हूं कि किसी एक व्यक्ति ने भी प्रेरणा पा कर यह राह पकड़ ली तो मेरा लिखना सार्थक हो जाएगा।

त्रिनगर के देवाराम पार्क में एक उच्च प्राथमिक विद्यालय, जिसे मिडिल स्कूल कहते हैं, कई वर्षों से चल रहा है। सरकार से कई वर्षों पहले मान्यता का मान पा चुका महावीर इंटरनेशनल स्कूल सिर्फ नामभर नहीं है, इसने कई आदर्श उदाहरण पेश किए हैं इसलिए यह स्कूल इलाके में बच्चों के सुनहरी भविष्य का प्रतीक बन गया है। इस स्कूल को इस मुकाम तक पहुंचाने में रेणु जी ने 27 वर्ष अथक परिश्रम किया है। त्याग, निष्ठा और ईमानदारी के साथ परिश्रम का मेल होने पर ही महावीर इंटरनेशनल जैसा स्कूल तैयार होता है।

स्कूल की ख्याति को देखते हुए हर मां-बाप यह चाह रखता है कि उनके बच्चे का महावीर इंटरनेशनल स्कूल में दाखिला हो। लेकिन, सीटें सीमित होने के कारण स्कूल प्रबंधन की भी मजबूरियां हैं-सभी को दाखिला नहीं दिया जा सकता। हर अच्छा स्कूल इस मजबूरी को झेलता है। असली बात अब कहूंगा। अभी तक जो भूमिका तैयार की उसका एक ही मकसद था कि आप मेरी असली बात का मर्म समझ सकें। स्कूल प्रबंधन ने 27 साल के इतिहास में 27 पैसे का भी डोनेशन नहीं लिया। डोनेशन देने वाले आते हैं और उन्हें हाथ जोड़ कर वापस भेजा जाता है। चारों ओर आपाधापी, लूटखसोट, बेइमानी और छल प्रपंच का माहौल है; धन तरक्की का मापदंड हो गया है; विद्या के तथाकथित मंदिर अभिभावकों को लूटने का कोई मौका नहीं चूकते; बिना डोनेशन दाखिला देना अपराध समझते हैं। ऐसे माहौल में इस तरह के आचरण की कोई कल्पना भी नहीं कर सकता। मै थोड़ा बहुत मनोविज्ञान समझता हूं, उस आधार पर कह रहा हूं कि आपको भी यकीन नहीं हो रहा होगा। आपकी भी गलती नहीं है। ऐसे माहौल में कोई इतने बड़े सच की उम्मीद कैसे कर सकता है। जब सच खांटी सच हो, स्याह सच हो तो उस पर आसानी से यकीन नहीं होता। पर यह सच वैसा ही सच है जैसे सचमुच सच होता हैं; मां की ममता जैसा सच।

दिल्ली के सभी स्कूल यानी सभी स्कूल सरकार से जमीन लेते समय कई वायदे करते हैं, सभी शर्तें मानने का वचन देते हैं लेकिन किसी स्कूल ने आज तक उन वायदों को पूरा नहीं किया; एक प्रतिशत भी नहीं। अगर स्कूलों की बुनियाद झूठ और फरेब पर टिकी हो तो वो बच्चों को क्या सिखाएंगे। महावीर इंटरनेशनल स्कूल इन सबसे हटकर है। माफ कीजिए, आप भूल से भी यह मत समझ लेना कि मैं तुलना कर महावीर इंटरनेशनल स्कूल को श्रेष्ठ साबित करने की कोशिश कर रहा हूं। तुलना कर सिर्फ यह बताना चाहता हूं कि थोड़ी बहुत शर्म बची है तो बाकी स्कूलों को सबक लेना चाहिए और अपना रवैया सुधारना चाहिए। बाकी स्कूल क्या सबक लें, यह बताने के लिए फिर महावीर इंटरनेशनल स्कूल की ओर रूख करता हूं। इस स्कूल ने सरकार से एक रुपए की मदद नहीं ली जबकि सैकड़ों गरीब बच्चों को मुत (मुत का मतलब मुत) शिक्षा दे चुका है। आज भी 65 गरीब बच्चे मुत शिक्षा पा रहे हैं। निहायत गरीब परिवार में जन्मे सेल्वराज ऐसे ही भाग्यशाली बच्चों में एक था जिसकी नींव इसी स्कूल में तैयार हुई और वो भी मुत। रेणु जी ने बताया कि आज सेल्वराज एक कंपनी में 85 हजार रुपए तनख्वाह पा रहा हैं। रेणु जी सेल्वराज की कामयाबी की कहानी बताते हुए बेहद खुश थीं, शायद अपने बच्चों की तरक्की पर भी इतनी खुश नहीं हुई होंगी।

रेणु जी का मानना है कि मौजूदा शिक्षा प्रणाली ही दोषपूर्ण हैं। घिसेपिटे ढर्रे पर बच्चों को पढ़ाया जाता है। बच्चों का मनोविज्ञान समझे बिना किताबें रटवा दी जाती हैं। उन्हें सिर्फ नौकरी पाने लायक बनाया जाता है। मानवीय मूल्यों को दरकिनार कर दिया जाता है। कितनी दुखद स्थिति है कि स्कूलों में मोरल साइंस जैसे अहम विषय को सबसे कम तवज्जो दी जाती है जबकि गिरते सामाजिक मूल्यों को देखते हुए इस विषय को सबसे अधिक अहमियत दी जानी चाहिए। अफसोस है कि स्कूल दुुकानों की शक्ल अख्तियार कर चुके हैं। इन्हें विद्या मंदिर कहना बेमानी होगा। गली गली में स्कूल खुल गए हैं जहां कम तनख्वाह पर काम करने वाले अयोग्य अध्यापक बच्चों का भविष्य बिगाड़ते हैं। बच्चों के भविष्य से खिलवाड़ करना सबसे बड़ा अपराध है और इस अपराध को रोकना सरकार और अभिभावकों की जिम्मेदारी है।

Wednesday, April 29, 2009

चुनाव का सारा भार पत्रकारों पर

सैर से लौटते हुए पंडित शिवानंद से मुठभेड़ हो गई। यूं तो पंडित जी से अक्सर भेंट हो जाती थी, लेकिन सुबह-सुबह चंदन में लिपटे पंडित जी चुनावी चर्चा में उलझाने के मुड से मिले थे। इसलिए उनकी ये मुलाकात मुठभेड़ की कैटेगरी में ही रखी जी सकती है। पूजा का लिबास और बातचीत का अंदाज कुछ खास, मानो वो भी चुनाव के रंग में रंगे हुए हों। यूं कहें किसी चुनावी पोस्टर में लिपटे हुए से लग रहे थे। वैसे चेहरा शांत था, कोई आक्रोश नहीं, चेहरे पर ना वाणी में। अभिवादन का भी पूरा वक्त नहीं दिया और सीधे सवाल सरका दिया-पत्रकार जी! अपने क्षेत्र में किस गधे को जिता रहे हो। सवाल में तंज रिस रहा था। मैंने उल्टे उन्हीं से सवाल किया- पंडित जी आज आप ‘पत्रकार जी’ कहकर व्यंग्य कर रहे हैं, कोई खास बात है क्या।
पंडित जी ने गंजे सिर पर हाथ फिराते हुए कहा- पत्रकार जी! चुनावी सीजन है। हमारे देश में चुनावी रथ नेता नहीं, पत्रकार खींचते हैं। चुनावी अखाड़े में उतरे नेताओं का वजन कूतते हैं। आपकी बिरादरी पर भारी बोझ आ जाता है। रात दिन आप देश सेवा में जुटे रहते हैं। सच पूछो, आप लोकतंत्र में चुनावी यज्ञ संपन्न कराने के लिए दिन-रात तपस्या करते हैं। चारों ओर पत्रकारों की ज्ञान गंगा बह रही होती है। पूरा देश उसमें डुबकी लगाता है। ऐसे तपस्वी पत्रकार की इज्जत करना हर नागरिक का पहला धर्म होना चाहिए। जब किसी पत्रकार को सम्मान के साथ ‘पत्रकार जी’ कहकर संबोधित करता हूं तो मानो मैं उसी धर्म का पालन कर रहा हूं।
पत्रकार जी! चैनल और अखबार क्या दिखा रहे हैं, छाप रहे हैं, मुझे उससे ज्यादा सरोकार नहीं है। आप तो ये बताइए अपने क्षेत्र में कौन गधा जीत रहा है। आप पूरे देश का लेखा-जोखा रखते हैं। टेबल पर बैठे-बैठे महाभारत के संजय की तरह 543 लोकसभा क्षेत्रों के हालात देख लेते हैं। किसी एक पार्टी या गठबंधन की सरकार भी बना देते हैं। मध्यावधि चुनाव की भविष्यवाणी भी कर देते हैं। इतना ज्ञान है आपके पास। आप बताइए अपने इलाके में कौन गधा हमारे मत का पात्र है। कौन जीत रहा है, अपन भी उसी के साथ हो जाएंगे।
थोड़ा-थोड़ा समझ में आ रहा था कि पंडित जी व्यंग बाण क्यों चला रहे हैं। पंडितों और ज्योतिषाचार्यों का कारोबार जो ठंडा पड़ा है। जनता का ध्यान सर्वे पर है। लोग अखबार पढ़ रहे हैं, टीवी देख रहे हैं। सभी जानते हैं कि कभी किसी का सर्वे सटीक नहीं रहा। फिर भी दिलचस्पी कम नहीं हो रही है। यहीं एक ऐसा पेशा है जिसमें झुठ बोलकर माफी मांगने की परंपरा नहीं है। आजतक किसी चैनल और अखबार ने सर्वे गलत होने पर कभी शर्मिंदगी का भाव प्रकट नहीं किया। आज पंडित जी पूरी तरह शर्मिंदा करने पर आमादा थे। बोले पत्रकार जी! कुछ तो बताइए। वैसे भी आपका आकलन गलत निकला तो हम आपको कटघरे में थोड़े ही खड़ा करेंगे। पंडित जी बड़ी विनम्रता से भिगो-भिगोकर वहीं मार रहे थे जो आजकल नेताओं की ओर मिसाइल की तरह चल जाते हैं। हमने पलटवार किया। पंडित जी! आप भी तो भविष्यवाणी करते हैं। नेताओँ का भाग्य पढ़ते हैं। सरकार बनाते-गिराते हैं। नेताओं की कुंडली में ग्रहों के घर बदलते रहते हैं। आप बताइए, अपने इलाके में कौन पहनेगा ताज। देखिए पत्रकार जी! हम भविष्यवाणी तो त्रिकालदर्शी पत्रकारों के सर्वे आने के बाद ही करते हैं। अभी थोड़ा समय लगेगा। सच पूछो तो पत्रकार ज्ञान के भंडार हैं, उन्हें दुनिया जहान की सारी जानकारी होती है। आप ज्ञानियों की सुनकर ही हम कुछ बोलेंगे। जवाब सूझ नहीं रहा था। पंडित जी अपने सात्विक किस्म के लजाने वाले विचारों को लालू के गरीब रथ की तरह ‘विजयी भाव’ से मेरी ओर ठेले जा रहे थे। मैंने कहा-पंडित जी। अच्छे भले इंसान चुनावी दंगल में लड़ रहे हैं। आप बार-बार उन्हें गधा क्यों कह रहे हैं ।पंडित जी थोड़े तैश में आए, थोड़ा थुथने फुलाए, थोड़ा गला साफ किया और बलगम को पूरी ताकत के साथ बगल की झाड़ी में विसर्जित करने के बाद बोले क्या बात कर रहे हैं पत्रकार जी। बात-बात में झूठ बोले, झूठे वायदे करे, वोट लेने के बाद पांच साल शक्ल ना दिखाए, सार्वजनिक धन पर नजर गड़ाए रखे, योग्य लोगों को प्रोत्साहन देने के बजाय रिश्ते-नातेदारों को आगे बढ़ाए। ऐसे लोगों को आप इंसान कहते हैं ? पत्रकार जी! हमारी लोकतांत्रिक विवशता है, ऐसे ही लोगों में से किसी एक को चुनना है। लोकतंत्र के महाकुंभ में मतदान की पवित्र सरिता में डुबकी लगाकर ‘पुण्य’ तो कमाते हैं लेकिन उस पुण्य का फल पूरे समाज के बजाय चंद लोग खा जाते हैं। हर चुनाव में यहीं होता है। हर बार इस उम्मीद के साथ मतदान केंद्र पर जाकर मशीन का बटन दबाते हैं कि शायद इस बार उम्मीदों पर खरा उतरने वाला नेता इस मशीन से बाहर आ जाए। हर बार निराशा हाथ लगती है लेकिन फिर भी हम मतदान की लोकतांत्रिक परंपरा को जरूर निभाते हैं। मतदान हमारा अधिकार है और यही अधिकार एक दिन बदलाव लाएगा।
पंडित जी कथावाचन की शैली में अपनी बात कहे जा रहे थे। अचानक उन्होंने पैंतरा बदला और मीडिया को भी घसीट लाए अपनी भावनाओं के झंझावत में। पत्रकार जी! निकम्मे, झूठे और लंपट नेताओं से मोहभंग हो गया है। ऐसे नेताओं से आप पत्रकार ही निपट सकते हैं। बराबरी का मुकाबला रहता है। आप लोग ना हों तो ना जाने ये नेता क्या कर दें। इसलिए चौथा स्तंभ ताकतवर माना जाता है। इस ताकतवर चौथे स्तंभ के त्रिकालदर्शी पत्रकारों को मेरा शत-शत प्रणाम।

Tuesday, April 7, 2009

प्रभाष जी, मेरी भी सुन लीजिए

श्रद्धेय प्रभाष जोशी जी का इंटरव्यू पढ़ा। मेरे बारे में उनके कहे गए अंश का जवाब देना चाहूंगा। लेकिन कुछ भी कहने से पहले उनसे हज़ार बार माफ़ी मांग लेता हूं। जब उन्होने कहा है तो जवाब देना भी ज़रूरी है। माफ़ी मांगने की दो वजहें हैं। एक,वो उम्र और अनुभव दोनों में ही मेरे से कहीं आगे हैं। इस नाते उनका सम्मान करता हूं। ये बात मैं पहले भी कह चुका हूं। दो, उनके "अपने" को पीड़ा होगी। छद्म नामों से मुझे धमकियां देंगे। मैं अदना सा पत्रकार हूं.धमकियों से डर लगता है। ख़ैर, अपनी बात शुरू करता हूं। मेरी सुनने से पहले वो अंश आप ज़रूर पढ़िए ,जो आदरणीय प्रभाष जी ने मेरे बारे में कहा है। कह रहे हैं। इन शब्दों को पढ़ने के लिए इसलिए आग्रह कर रहा था ताकि आप मेरी बात को ठीक से समझ सकें। जी ,मैं टीवी पर काम करता था। दिसबंर में स्वर्गीय कमलेश्वर जी ने मुझे न्यूज़ कास्टर एप्रूव किया था। तब कमलेश्वर जी दूरदर्शन न्यूज़ के हेड थे। उन दिनों स्क्रीन पर आने से पहले लंबी प्रक्रिया से गुज़रना होता था। लिखित परीक्षा,वॉयस टेस्ट और अंत में स्क्रीन टैस्ट। पांच विशेषज्ञों की कमेटी फ़ैसला करती थी। इस प्रक्रिया में मैं क़ामयाब रहा और दिसंबर के अंतिम सप्ताह में मुझे बुलेटिन पढ़ने को दिया गया। उन दिनोंशाम छह बजे दो मिनट का बुलेटिन टेलीकास्ट होता था। न्यूज़कास्टर ( जो अब एंकर कहलाते हैं) खड़ा होकर बुलेटिन पढ़ता था। उसी बुलेटिन से मैंने दूरदर्शन में काम करने की शुरूआत की। क़रीब डेढ़ साल बाद जनसत्ता में भर्ती होने का विज्ञापन निकला। वहां भी कड़ी प्ररीक्षा से गुज़रकर नौकरी हासिल की। सरकारी नौकरी छोड़कर जनसत्ता गया था। प्रभाष जी ने साफ कहा था कि ज़्यादा नहीं दे पाएंगे। जितना पा रहे हो, उससे कम नहीं होने देंगे। पहली तनख़्वाह पर पैसा कम मिला था,जिसे प्रभाष जी ने तुरंत कंपसेट कर दिया था। मेरी भूल थी कि मैंने दूरदर्शन में काम करने का ज़िक्र नहीं किया। पर कुछ दिनों बाद प्रभाष जी को ख़ुद ही पता चल गया था। उन्होने इस पर एतराज़ किया लेकिन बाद में मेरे एक सहयोगी( जो िस समय बड़े प्रतिष्ठान में संपादक हैं ) के आग्रह करने पर दूरदर्शन में समाचार वाचन की मौखिक मंज़ूरी दे दी। उन्होने एक बार स्क्रीन पर मुझे देखकर मेरी टाई पर टिप्पणी भी की थी और अच्छी टाई पहनने की सलाह देते हुए मुझे एक टाई भी भेंट की थी। वो टाई आज भी मेरे पास है। सहेजकर रखी है उसी " पत्र " की तरह। अब आप ख़ुद ही फ़ैसला कर लीजिए कि क्या मैं उनकी मर्ज़ी के खिलाफ दूरदर्शन में काम कर रहा था.

शायद मार्च का महीना रहा होगा.उन्होने प्रोमोशन का पत्र एच.आर. मंगाकर अपने पास रख लिया। शर्त लगा दी- दूरदर्शन छोड़ दो और प्रोमोशन लेटर ले जाओ। मुझे दुख इस बात का था कि संपादक एचआर का काम कर रहा था। संपादक प्रोमोशन के लिए संस्तुति करता है.प्रोमोशन लेटर एच.आर.देता है। किसी भी संस्थान में दोहरे मापदंड नहीं होते। भोपाल संवाददाता को बीबीसी के लिए काम करने की इजाज़त दी गई थी। वो जनसत्ता के ख़र्चे पर कवरेज के लिए जाता था और ख़बर छपने से पहले बीबीसी को भी मुहैय्या कराता था। उसे एक के बाद एक प्रोमोशन देकर मार्केटिंग विभाग से उठाकर पत्रकार बनाया गया। इसलिए भाषा और ख़बरों से कोई रिश्ता नहीं था। जनसत्ता में किसी भी उप संपादक दो देर से आने का दंड देने के लिए उन्ही संवाददाता की कॉपी एडिट करने के लिए दी जाती थी। आप कहेंगे कि ऐसे अयोग्य व्यक्ति बीबीसी के लिए कैसे काम कर सकता है। बड़े बैनर से जुड़े व्यक्ति की योग्यता नहीं परखी जाती,उसे साख पर काम दे दिया जाता है। और फिर स्वर्ग में सभी पालकियों में नहीं चलते,पालकी ढोनेवाले भी होते हैं।

मैंने ये दलील दी थी कि दूरदर्शन कभी आफिस टाइम में नहीं जाता। पर एक न सुनी गई। प्रोमोशन रोक दिया गया। खुन्नस कुछ और थी। एक्सप्रेस ग्रुप में दो बार हड़ताल हुई। प्रभाष जी ने हड़ताल तुड़वाकर चंडीगढ़ से अख़बार निकलवाने की कोशिश की। संपादक के नाते उन्हे ऐसा करना भी चाहिए था। लेकिन उनके कहने पर कुछ लोग हड़ताल तोड़ने को राज़ी नहीं हुए। उन्ही में से एक मैं था। दोनों बार मैं वर्करों के साथ जटा रहा। हड़ताल समर्थक जनसत्ताईयों की गाहे बगाहे दुर्गति देखने को मिलती थी। कुछ छोड़कर चले गए। एक साथी का निधन हो गया। मैं डटा रहा और ख़ामियाज़ा भुगतता रहा। बलबीर पुंज नेपथ्य से हड़ताल तु़ड़वाने में लगे थे। उन्हे जब भी मौक़ा मिलता , वो कर्मचारी को समझाते थे कि हड़ताल से कर्मचारियों का नुक़सान है। पहली हड़ताल क़रीब साठ दिन चली। सभी को पीड़ा थी प्रभाष जी के आदेश को न मानने की। हम हड़तालियों को सभी हड़ताल तोड़ू हेय नज़रों से देखते थे। वर्कर को दग़ा देने के अपराध में शर्मिंदा उन्हे होना चाहिए था, लेकिन हमें नीचा दिखाया जा रहा था। उनकी मेजोरिटी थी। हमारा सोशल बॉयकॉट किया गया। इसके अगुवा थे समचार संपादक जो बाद में जनसत्ता के संपादक भी बने। इस बॉयकॉट का मेरे उसी साथी ने विरोध किया,जिनका मैं दूरदर्शन में काम करने की इजाज़त दिलवाने के लिए प्रयास करने का ज़िक्र कर चुका हूं। दूसरी हड़ताल में भी इस घटना की पुनरावति हुई। मेरी पत्नी को भी समझाया गया था कि वो मुझे प्रभाष जी की सलाह माने लेने की थोड़ी अक्ल दे। मैंने उससे इतनी ही कहा- मुझे वो काम करने की सलाह मत दो,जिससे मुझे हमेशा अपराध बोध रहे और आजीवन शर्म से गड़ा रहूं। इस बार भी दो महीने बाद हड़ताल टूटी। दीपावली हड़ताल में मनीं। कैसी रही होगी दीपावली। रहली दीपावली भी बदरंग रही थी। इस बार फर्क इतना था हड़ताल टूटने के बाद हमारा सोशल बॉयकॉट नहीं हुआ।

प्रभाष जी ने कहा है कि गोयनका जी लोगों के बारे में गालियों से बात करते थे। जनसत्ता की 21 साल की नौकरी में गोयनका जी को दो बार देखा। एक बार गाड़ी से उतरकर दफ्तर जाते हुए और दूसरी बार खादी की बनियान ( बंडी)और दोती में ऊंचे स्वर में गालियां देते हुए। कई घंटों से बिजली गुल थी। उनका धैर्य टूट गया था और मैनजमैंट के लोगों को गालियां देते हुए बाहर चबूतरे पर आ गए थे। ये सच है कि वो गाली देते थे। लेकिन सिर्फ इर्द गिर्द रहनेवाले लोगों को। आप जानते है कि संपादक और प्रबंधन के आला अफसरों के अलावा और कौन उनके पास जाता होगा?

Monday, February 9, 2009

रद्दी वाला भी हिन्दी को भाव नहीं देता , क्यों ?

"भाई साहब" ब्रांड पत्रकारिता का बहुत छोटा सा प्यादा रहा हूँ। आप पहली तीन किस्तें पढ़ कर समझ गए होंगे। राजा और वजीर कहानी बहुत लम्बी है कभी न ख़त्म होने वाली। बस पात्र बदलते हैं, पीड़ा भोगने और पीड़ा सहने का सिलसिला मुसलसल चल रहा है और चलता रहेगा। राजा और वजीर अपना स्वाभाव नहीं बदलते और प्रजा (प्यादा भी कह सकते हैं) ज़ुल्म सहने के लिए ही होती है। इसलिए कहानी का रुख अब किसी खास ओहदे की और नहीं मोड़ रहा हूँ जो भोग है वही लिख रहा हूँ।

मैंने खास तौर से एक विशेषण इस्तेमाल किया है "भाई साहब" ब्रांड हिन्दी पत्रकारिता। लंबे अनुभव के बाद हिन्दी पत्रकारिता का यही चरित्र समझ में आया। कहीं वैचारिक मतभेद हो तो माफ़ कर देना। एक जमात (पत्रकारों की) राजा और वजीर को "भाई साहब" कह कर अक्सर सम्भोदित करती है और दोनों जमात के पत्रकारों के बीच बडे भाई और छोटे भाई का रिश्ता कायम हो जाता है। फिर "भाई" मिलकर मिशनरी पत्रकारिता के रथ को खींचते हैं। उस रथ के पथ पर कोई बेवजह खडे होने की घ्र्ष्टता करता पाया गया तो रथ के पहिये से कुचला भी जा सकता है।

एक्सप्रेस ग्रुप की लम्बी नौकरी में एक बात और समझ में आई। भाई साहबों की पत्रकारिता मिस्टर सो एंड सो ब्रांड की पत्रकारिता के सामने मिम्म्याती सी नज़र आई। मुझे ये भी ज्ञान प्राप्त हुआ के हिन्दी ही नहीं वर्नाकुलर लैंगुएज journalism की अंग्रेज़ी के सामने स्वाभाविक दास जैसी स्थिति है। अंग्रेज़ी की उपेक्षा कर किसी भी भारतीय भाषा में पत्रकारिता नहीं हो सकती। हिन्दी के मठाधीश पत्रकार भी इंग्लिश जर्नलिस्ट के आगे अपनी हैसियत का एहसास रखते हैं। यह सब यूँही नहीं है। मालिकों से लेकर रद्दी खरीदने वाला कबाडी तक यह एहसास है। कबाडी वाला हमेशा अंग्रेज़ी अख़बारों के मुकाबले हिन्दी अखबारों की रद्दी कम दामों पर खरीदता है। हलाँकि में ने कई बार कबाडी से कहा - भाई मैं अखबार में काम करता हूँ । एक्सप्रेस और जनसत्ता एक ही न्यूज़ प्रिंट पेपर पर छपते हैं एक ही मशीन है, स्याही में कोई फर्क नहीं है, छापने वाले लोग भी वही हैं, फिर रद्दी के दामों में फर्क क्यों? रद्दी वाला कबाडी एक ही जवाब देता है - आप सच बोल रहे है पर दोनों में फर्क तो है, हिन्दी के दाम अंग्रेज़ी के बराबर नहीं लगा सकता। और जिस भाषा से रोटी खाता हूँ उसे सस्ती मान कर रद्दी बेच देता हूँ। कबाडी इस फर्क को समझता है या उसे यह फर्क समझाया गया है? तो मैं कैसे मान लूँ के अखबारों के मालिक इस यथार्थ को नहीं समझते होंगे।

विदेश में कवरेज की बात आती है तो प्रबंधकों की दलील होती है : खर्चे कम करो। अंग्रेज़ी का पत्रकार प्रेजिडेंट, पी एम् के साथ जाएगा और हिन्दी में उसका अनुवाद हो जायेगा। कभी ऐसा नहीं देखा के हिन्दी का पत्रकार भूले भटके चला जाए और अंग्रेज़ी वाले अनुवाद कर लें। खेलों की कवरेज भी ऐसे ही होती है। एक बार प्रतिष्ठित ग्रुप ने तो यहाँ तक फ़ैसला कर लिया था की उनका सर्वाधिक सिर्कुलेशन वाला राष्ट्रीय हिन्दी दैनिक पूरी तरह अंग्रेज़ी अखबार का अनुवाद होगा। इस का ज़ोरदार विरोध हुआ और प्रबंधकों को फ़ैसला वापस लेना पड़ा। काश ! हिन्दी के साथ सौतेला व्यव्हार मिटाने के लिए भी ऐसा ही कोई विरोध होता; किसी आन्दोलन की शक्ल में।

कुछ मालिक अंग्रेज़ी अखबारों के साथ हिन्दी अखबार इस लिए निकालते हैं के दो भाषाओँ में विज्ञापन देने की औपचारिकता निभाने वालों को निराश ना लौटना पडे। यही वजह है के विज्ञापन पैकेज में अंग्रेज़ी के साथ हिन्दी को क्लब किया जाता है नही के हिन्दी के साथ अंग्रेज़ी को।

अब लाइब्रेरी में आ जाएये, वहां भी ऐसी ही स्थिति है। क्लिप्पिंग अंग्रेज़ी अखबारों की राखी जाती है। अपवाद स्वरूप किसी संस्थान में हिन्दी अखबारों की क्लिप्पिंग रखने का चलन शुरू हो गया हो तो इसकी जानकारी नहीं है। बहुत जानने की कोशिश की कोई मुकम्मल जवाब नहीं मिला। बस फर्क है! अंग्रेज़ी सुपेरिओर है और हिन्दी दोयम दर्जे की।

दर्जे का दर्द सभी झेलते हैं, महसूस करते हैं पर सामाजिक स्थितियां इस फर्क को मिटाने के लिए किसी को प्रेरित नहीं करती हैं। हम इसे नियति मान कर चले जा रहे हैं। कुछ पत्रकार दोहरा दर्द सहते है। उन्हें अपनी ही "बस्ती" में न्याय नहीं मिलता, फिर वो निष्ठां से काम करते रहने का संतोष ज़रूर पाना चाहते हैं; शायद विकल्प के अभाव में मजबूरी को निष्ठां का जामा पहना देते हैं।

Saturday, February 7, 2009

जनसत्ता के “खाकी निकरवालों” को मैं “ लाल” उमेश चुभता रहा


अक्खड़ स्वभाव और अखाड़ेबाज़ संपादकों के कारण जनसत्ता में पूरी पारी नहीं खेल पाया। अपनी सबसे बड़ी कमी एक और भी थी। मैं खाकी निकर पहनकर दफ्तर नहीं जाता था। खाकी निकरवालों के लिए सब माफ था। अक्खड़ स्वभाव भी बर्दाश्त हो जाता था। लेकिन मेरे “ लाल” रंग को देखकर दो संपादकों तो हर वक़्त बिदके रहे, मरखने सांड़ की तरह।
“ बेचारे” निकाल तो सकते नहीं थे, तरक्की देना ज़रूर उनके हाथ में था। उसमें खुलकर बेशर्मी का खेल खेला गया। सारे क़ायदे –क़ानून को ताक पर रखकर खाकी निकरवालों को तरक्की देकर हमें पीछे छोड़ दिया गया और संकेत दिया गया कि ऐसा ही होगा; अपमानित होकर रहना चाहो तो रह सकते हो। उन दो संपादकों में से एक का रिकार्ड तो यही रहा है कि , जहां भी गए हैं अपना गुट तैयार किया है। मुझे उन संस्थानों के मालिकों से हमदर्दी रही है । वो मालिक भी क्या करे, उन्हे मक्कारी के जाल में फंसाल कर ऐसा इंप्रेशन दिया जाता है कि उनसे ( संपादक जी) भला “व्यक्ति” और “ योग्य” संपादक कोई और हो ही नहीं सकता। उनकी योग्यता और प्रतिभा किन क्षेत्रों में है, इसका मैं संकेत दे ही चुका हूं। धीरे-धीरे कई चौखट घिस चुके हैं। जहां जाते हैं, जल्द ही उनकी असलियत मालिक और मातहत समझ जाते हैं और “ नागरिक अभिनंदन” कर विदा कर दिए जाते हैं। इन स्थितियों को मैं पत्रकारिता का साइलेंट टैररिज़्म मानता हूं।
जनसत्ता के एक संपादक बनवारी जी का ज़िक़्र करना ज़रूर चाहूंगा. जिनमें सहीं मायने में संपादक की गरिमा थी। सरल, सहज और संकोची स्वभाव; सहकर्मियों के हमदर्द। दफत्र में वो अकेले सीनियर पत्रकार थे, जिनका हर कोई इज्ज़त करता था। वो भी प्रबंधकीय निक्कमेपन से दुखी होकर जनसत्ता छोड़ गए। प्रबंधकों को ‘सत्यानाशी” संपादक की ज़रूरत थी और बनवारी जी में वो गुण नहीं थे। इसिलए उनके साथ भी वही किया गया, जो मेरे साथ हुआ।
प्रभाष जी की प्रतिभा का मैं क़ायल रहा हूं। मैं हूं क्यों, जनसत्ता का हर पाठक औऱ हर कर्मचारी प्रभाष जी को बेजोड़ संपादक मानता है। लेकिन कई बार वो संपादक कम और मालिक ज़्यादा दिखते रहे। उनकी भाषा से अहसास होता था कि रामनाथ गोयनका की आत्मा उनमें प्रवेश कर गई है। एक उन्होने मुझे लिफ़ाफ़े में बंद कर चंद लाइनों का पत्र भिजवाया था, जो आज भी मैं संभाल कर रखा है। उसमें प्रभाष जी का दंभ, क्रूरता और राग-द्वेष कूट-कूटकर भरी हुई है। शायद रामनाथ गोयनका ने भी कभी वो भाषा इस्तेमाल नहीं की होगी। वो पत्र देखकर बनवारी जी बेहद आहत हुए थे।
जनसत्ता में मेरे कार्यकाल के अंतिम संपादक ने अपने पूर्ववर्ती संपादकों की परंपरा को बखूबी निर्वहन किया । उन्हे “परपीड़ा” में जो सुख मिलता है, वह शब्दों में बताना मेरे लिए मुमक़िन नहीं है। अंतत: मैं योग्य, निर्भीक , प्रतिभाशाली, मूर्धन्य और जनसत्ता ब्रांड के संपादकों के सामने नहीं टिक पाया औऱ हारे योद्धा की तरह श्वेत ध्वज लेकर 4 मई 2004 को विशाल एक्सप्रेस बिल्डिंग से बाहर निकल आया। वीआरएस के पेपर साइन कर निकला था। फिर भी उस रात को ड्यूटी पर गया। उस रात मुझे एडिशन निकालना था। नाता तो दिन में ही टूट गया थालेकिन प्रोफेशनल ज़िम्मेदारी से भागना फितरत में नहीं है। इसलिए एडिशन छोड़कर ही अपनी ज़िम्मेदारी से मुक्त हुआ।
आगे क्या करता है; इसकी कोई योजना नहीं थी। कुछ दिन दिल्ली में बिताकर गांव चला गया था। खेती-बाड़ी करने का मूड था। पहले खेती-किसानी कर चुका हूं। खेतों में हल चलाया है, फ़सलों की बिजाई-कटाई अपने हाथों से की है। ठेठ किसान रहा हूं। फिर से किसानी करने में परहेज़ भी नहीं है। लेकिन टोटल टीवी के डायरेक्टर विनोद मेहता का संदेशा आया. जुड़ने के लिए। एक बार फिर कमर कस कर 22 अक्तूबर 2004 को पत्रकारिता से जुड़ गया । तब से कलम के बजाए कंठ की पत्रकारिता कर रहा हूं। कलम कभी-कभार।

क्रमश:

Wednesday, February 4, 2009

वो उफान भी देखा और अब......


दूरदर्शन और टोटल टीवी में काम करने के अनुभाव के बारे में आगे चलकर सुनाऊंगा। एक बार फिर पीछे जनसत्ता की ओर। नया अख़बार था। कई सवाल थे। कैसा होगा ? जमे हुए अख़बारों के सामने क्या टिक पाएगा ? क्या एक्सप्रेस का अनुवाद होगा ? क्या एक्सप्रेस की छाया में धूमिल दिखाई देगा ? स्टाफ में सभी यंग थे। कड़ी परीक्षा से गुज़रने के बाद नियुक्ति मिली थी सभी को। लेकिन प्रतिभाशाली टीम थी। सभी लिक्खाड़ , पेशे के प्रति समर्पित थे। प्रभाष जोशी संपादक थे। उन्होने नियुक्तियों के लिए विज्ञापन से पहले ही तय कर लिया - पैरवी वाले किसी व्यक्ति को नहीं रखना है। कहा था- अख़बार चलाना है, बंद करवाना नहीं है। इसलिए योग्यता की छलनी से छनकर जो आएगा, वही जनसत्ता में काम कर पाएगा। मुझे भी अवसर मिला और 21 साल ( क़रीब ढाई महीने कम ) जनसत्ता से जुड़ा रहा। अख़बार बॉक्स आफिस पर हिट फिल्म की तरह चल निकला। खाड़की क़िस्म की यंग ब्रिगेड की मेहनत और सृजनशीलता का असर अख़बार के पहले पन्ने से अंतिम पन्ने तक दिखाई देता था। सभी में जोश था , अख़बार को नई ऊंचाईयां देने का जज़्बा था। रात-दिन काम किया और मेहनत करने की नींव वहीं पड़ी।

इंदिरा गांधी की हत्या के बाद उत्तर भारत में हुए सिख विरोधी दंगों की रिपोर्टिंग में जनसत्ता ने नई पहचान बनाई। ख़बरें ये भी आ रही थीं कि राज्यों की राजधानियों में अख़बार ब्लैक में बिक रहा है। जयपुर में 10 रुपए में बिकते सुना गया। प्रिटिंग की ज़्यादा क्षमता न होने के कारण दो लाख 10 हज़ार का प्रिंट होने के बाद संपादक को अपील जारी करनी पड़ी- ज़्यादा नहीं छाप सकते, मिल बांट कर पढ़िए। शायद ऐसा दौर किसी अख़बार ने न देखा हो। लेकिन आज जिस दौर से अख़बार गुज़र रहा है , वह दौर भी किसी अख़ाबर ने नहीं देखा होगा।

अख़बार की बुलंदी और फिर पोलियोग्रस्त होने के लिए इसके संपादक ही ज़िम्मेदार रहे हैं। राग-द्वेष वाले संपादकों ने अपने और चेहतों के हित के लिए सत्यानाश कर दिया। मुझे स्कूल के एक हेडमास्टर की सुभाषित याद आती है, जो प्रभाश जी के बाद आए सभी संपादकों पर खरी उतरती है।
हेडमास्टर लजी कहा करते थे- जिस स्कूल में जाता हूं, पहले थोड़ा विकास करता हूं, विश्वास जीतने के बाद विनाश शुरू करता हूं और फिर सत्यानाश कर देता हूं।

अखाड़ा बन गया थखा अख़बार का दफ़्तर। आकंठ डूबे थे संपादक जी। बाड़ ही खेत को खा रही थी, भला खेत कैसे बचता !

उन सभी "महान" संपादकों के बारे में लिखने के मन है लेकिन उनके लिए कुछ भी लिखकर उन यादों को ताज़ा नहीं करना चाहता;मन ही ख़राब होगा, हासिल कुछ नहीं होगा। हिंदी का दुर्भाग्य है कि उसे सुपात्र संपादक कम ही मिल पाते हैं।

जनसत्ता का ज़िक्र प्रभाष जी को याद किए बिना अधूरा रहेगा। उनमें सिर्फ़ एक ख़ूबी पाई। उन्होने अपने पत्रकारों को काम करने की ख़ूब छूट दी। 21 वर्षों में किसी पत्रकार की ख़बर रोकते नहीं देखा। बड़े संस्थान का अख़बार था इसलिए विज्ञापन के लालच में ख़बर करने को कभी प्रोत्साहन नही दिया। एक-दो बार तो ऐसा देखा कि किसी कंपनी की नेगेटिव ख़बर उसके विज्ञापन के बगल में छापी गई। अब आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि ख़बरों को कितना महत्व दिया जाता था। कहीं कोई समझौता नहीं । इस ख़ूबी के अलावा क्या था प्रभाष जोशी में, वो गोल कर रहा हूं। ये मत समझिए कि 'जोशीवाद' से प्रभावति हूं। बस ! जूठ नहीं बोल सकता, सच कहने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा हूं। पर ये वायदा रहा , अगले अंक उसी शख़्सियत का ज़िक़्र करूंगा , जिसके बारे में सच कहने की हिम्मत कर सकूं।

क्रमश:

Monday, February 2, 2009

बहुत बड़ी दुविधा होती है जब ख़ुद के बारे में कुछ लिखना पड़ता है। कहीं ज़्यादा हो गया तो हज़ार तरह के कमेंट सुनने-पढ़ने को मिलेंगे। ऊंची छोड़ दी, बड़बोला हो गया है , औकात से बाहर बोलने लगा है आदि-आदि कमेंट अनादि काल तक आलोचकों के तरसकश से निकलते रहेंगे। आप ख़ुद को कोसेंगे कि क्या पड़ी थी ब्लॉग शुरू करने की?अब तक बिना ब्लॉग के भी ज़िंदगी अच्छी-भली चल रही थी।
कहीं उलट हो गया और आलोचकों के व्यंगवाणों से आहत होने के डर से अति विनम्रता की चादर ओढ़कर आप सबके सामने आ गया तो ग़ैर आलोचक ( वो लोग, जो ख़ानदानी परंपराओं का निर्वाह करने की विवशता में आलोचना करते हैं लेकिन खुर्राट आलोचक की विधिवत उपाधि नहीं मिली है ) उस चादर को , जो मैली सी नहीं है लेकिन नाज़ुक सी है, फाड़कर तार-तार कर देंगे। इन दो किनारों के बीच खड़ा हूं। सच बोलने की आदत और दोनों किनारों पर बैठे हुए डर के कारण ख़ुद को संतुलित बनाकर ही कहूंगा। फिर भी कुछ भूल-चूक रह जाए तो माफी भी मांग लूंगा। बात ब्लॉग शुरू करने की आई तो सभी मित्रों का पहला सवाल था- अरे ! अभी तक आपने ब्लॉग शुरू नहीं किया ? आजकल ब्लॉग के बिना पढ़े -लिखे की नहीं बन पाती। आउट-डेटेड माना जाता है। बात एकदम सही है। आजकल की पत्रकारिता के ज़माने में हम जैसे लोग आउट डेटेड माने जाते हैं। हम लफ्फाजी नहीं करते, तथ्यों की जांच परख किए बिना उनकी इस्तेमाल नहीं करते, एक तरफा ख़बर नहीं करते, फल-सब्ज़ी का ठेला लगानेवालों की तरह ख़बर नहीं बेचते, आर्कुट पर अपना प्रोफाइल डालकर अति आधुनिक होने का स्वांग नहीं रचते, ख़बरों को प्रोफाइल की कसौटी पर नहीं कसते, मर्सिडिज़ का विज्ञापन लेने के लिए झोंपड़ी में ग़रीब की बेटी के साथ हुए बलात्कार की ख़बर को बनने से नहीं रोकते, ऐसे अनिगनत प्वाइंट हैं, जिन पर हम खरे नहीं उतरते और आउट डेटेड कैटेगरी में दकेल दिए जाते हैं।
चलिए आगे बढ़ता हूं। मैं आउट डेटेड पत्रकार वर्षों से कलमघिस्सू रहा। जनसत्ता से जुड़ा, सरकारी नौकरी छोड़कर। प्रबाष जोशी के कड़े इम्तिहान को पास कर इंटरव्यू देने पहुंचा तो एक सवाल ये भी पूछा गया - सरकारी नौकरी जैसी जॉब सिक्यूरिटी नहीं है फिर भी पत्रकार बनना चाहते हैं। जवाब जो सूझा, वो दे दिया लेकिन इंटरव्यू बोर्ड के सदस्यों को यह ज़रूर लगा होगा कि कीड़ा काटा हुआ है, आने दो। दरवाज़े कोल दिए गए और मैं पत्रकारिता की दुनिया में 1983 में प्रवेश कर गया। अर्थशास्त्र में एमएम किया था, साथ में हिंदी में भी एमए था, इसलिए आर्थिक पत्रकारिता की ज़िम्मेदारी दी गई। मेरा प्रिय विषय भी था इसलिए इस ज़िम्मेदारी को क़रीब 16 साल निभाया। लेकिन जनसत्ता में हर विषय पर ख़बर लिखने की छूट होने के कारण खेल-कूद को छोड़कर सभी विषयों की रिपोर्टिंग की।
जनसत्ता से जुड़ने से पहले दूरदर्शन में समाचार वाचक ( आज की भाषा में एंकरिंग कह सकते हैं) हो गया ता। कमलेस्वर जी ने मुझे एप्रुव किया था। उन दिनों लिखित परीक्षा के बाद आडिशन देना होता था। गंवई माहौल से आया था फिर भी दोनों कसौटियों पर खरा उतरा और मुझे न्यूज़ रीडिंग का मौक़ा दिया गया। उन दिनों शाम छह बजे नया बुलेटिन शुरू हुआ था, सिर्फ दो मिनट का। खड़े होकर पढ़ना पढ़ता था। उसी बुलेटिन के लिए 27 दिसंबर 1981 को पहला मौक़ा मिला। 27 साल पहले शुरू किए इस सफ़र में मैं आज भी युवा पीढ़ी से क़दम मिलाकर चल रहा हूं। इसके लिए मैं हमेशा अपने दर्शकों का आभारी रहूंगा। सबसे अधिक आभारी हूं टोटल टीवी के डायरेक्टर विनोद मेहता का, जिन्होने युवा एंकरों की लंबी कतार के बीच मुझे खड़ा करने का रिस्क लिया। उनकी उम्मीदों पर मैं खरा उतरा, ये तो दावे के साथ नहीं कह सकता लेकिन भरपूर प्रयास ज़रूर किया।
क्रमश: